Poetrex

वक्त ने वक्त को वक्त से देखा

झूठी इन हाथों की लकीरों को बड़े सख्त से देखा

पढ़ पाया न खुद इनको

जब वक्त को हाथों से फिसलते देखा ।।

लफ़्ज़ों को लफ़्ज़ों से लफ़्ज़ों का नया राग मिल जाता है

फिर दिलों का ऐसा अल्फ़ाज़ बन जाता है

नज़रों से नज़रों का एक ख्वाब बन जाता है

जब आती है भवार तो ये घमासान बन जाता है ।।

Published by pratibha parihar

Writer ,poet Science student

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