Poetrex

तितर बितार सा बिखरा – बिखरा

नग्न कड़ ” सुख ” सा

भरम इन आंखों का ।।

मोह विरह सी कोठारी

छलक गई जो अंजुरी

कल बेसुध नींद में तेरी

दोस लगा हस्त – रेख़ को

अब क़िस्मत करत है तांडव ।।

उलझाकर लफ़्ज़ों का ताना – बाना

अधकुचले से एम्तहन कुछ शेष रहे ।।

Published by pratibha parihar

Writer ,poet Science student

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