तितर बितार सा बिखरा – बिखरा
नग्न कड़ ” सुख ” सा
भरम इन आंखों का ।।
मोह विरह सी कोठारी
छलक गई जो अंजुरी
कल बेसुध नींद में तेरी
दोस लगा हस्त – रेख़ को
अब क़िस्मत करत है तांडव ।।
उलझाकर लफ़्ज़ों का ताना – बाना
अधकुचले से एम्तहन कुछ शेष रहे ।।
तितर बितार सा बिखरा – बिखरा
नग्न कड़ ” सुख ” सा
भरम इन आंखों का ।।
मोह विरह सी कोठारी
छलक गई जो अंजुरी
कल बेसुध नींद में तेरी
दोस लगा हस्त – रेख़ को
अब क़िस्मत करत है तांडव ।।
उलझाकर लफ़्ज़ों का ताना – बाना
अधकुचले से एम्तहन कुछ शेष रहे ।।