Poetrex

वक्त ने वक्त को वक्त से देखा

झूठी इन हाथों की लकीरों को बड़े सख्त से देखा

पढ़ पाया न खुद इनको

जब वक्त को हाथों से फिसलते देखा ।।

लफ़्ज़ों को लफ़्ज़ों से लफ़्ज़ों का नया राग मिल जाता है

फिर दिलों का ऐसा अल्फ़ाज़ बन जाता है

नज़रों से नज़रों का एक ख्वाब बन जाता है

जब आती है भवार तो ये घमासान बन जाता है ।।

Poetrex

दो लब्ज़ खत के लिख कर

कहीं मुकर न जाना

कि तुम उम्मीद बने हो किसी की

यूहीं कहीं बिखर न जाना ।।

कि सिमट जाना बाहों में

क्या में वाकिफ नहीं हूं धडकनों से

समझो इसे कि तुम ख्याल ये इश्क़ हो किसी का

अब फिर कहीं और मत बरस जाना ।।

Poetrex

अब ढूंढ रहे हैं दीप उजाले

निशब्द स्वेत स्मृति से

व्याख्या जैसे चल रही है

मौन इशारे करतब सी ।।

बैठी – बैठी कोस रही है आढी – तिरछी हस्त रेख को

जीवन उल्लेख आ-वर्डित सा

कर्म भविष्य के है प्रधान ।।

धन प्रेम और वस्त्र सब मोह मया

फिर काहे छलकत आंसू रात अंधेरे में ।।

Poetrex

बस दो दिन की ही तो थी

इसको भी तूने न जाने किसके हवाले कर दिया

बस धोखा है

भरम है

इस दुनियां का यही चलन है।।

रोते हैं लोग यहां

अपने ही मज़ा लेते हैं

वे बेवजह की पगडंडियों पे खुद को ही सज़ा देते हैं

रिश्तों से भरी इस जिंदगी को खिलौनों सा खेलते हैं

इंसान कहां हम तो हेवानों से बोलते हैं ।।

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