Poetrex

तितर बितर सा बिखरा बिखरानग्न कड़ सुख साभरम इन आंखों का।। मोह विरह सी कोठारीछलक गई जो अंजुरी कल बेसुध नींद में तेरीदोष लगा हस्त रे ख कोअब क़िस्मत काहे करत है तांडव ।। उलझाकर लब्जो का ताना Yबस अधकुचले से एम्तहन कुछ सेश रहे ।।

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